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भारत की शिक्षा व्यवस्था बनाम CBSE, ICSE और फिनलैंड मॉडल: क्या बदलेगा तो बेहतर होगा भविष्य?

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भारत की शिक्षा व्यवस्था बनाम CBSE, ICSE और फिनलैंड मॉडल: क्या बदलेगा तो बेहतर होगा भविष्य?
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एक नजर में
  • शीर्षक: भारत की शिक्षा व्यवस्था बनाम CBSE, ICSE और फिनलैंड मॉडल: क्या बदलेगा तो बेहतर होगा भविष्य?
  • श्रेणी: education
  • स्थान: वाराणसी, उत्तर प्रदेश
  • पूरी जानकारी के लिए नीचे दी गई खबर पढ़ें।

 

भारत की शिक्षा व्यवस्था बनाम CBSE, ICSE और फिनलैंड मॉडल: क्या बदलेगा तो बेहतर होगा भविष्य?

भारत में शिक्षा को हमेशा सामाजिक और आर्थिक विकास की सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ियों में माना गया है। देश में लाखों बच्चे सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ते हैं और CBSE, ICSE, राज्य बोर्ड तथा दूसरे शैक्षणिक बोर्डों के माध्यम से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करते हैं। लेकिन आज एक बड़ा सवाल सामने है—क्या भारत की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था बच्चों को केवल परीक्षा के लिए तैयार कर रही है या वास्तव में उन्हें जीवन और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार कर रही है?

दूसरी ओर, फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था को दुनिया में छात्र-केंद्रित, समान अवसर और सीखने के अनुभव पर जोर देने वाले मॉडल के रूप में अक्सर चर्चा में रखा जाता है। हालांकि फिनलैंड की व्यवस्था को भारत में हूबहू लागू करना संभव नहीं है, लेकिन उसके कुछ सिद्धांत भारतीय शिक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार ला सकते हैं।

भारत में नई शिक्षा नीति 2020 के बाद शिक्षा व्यवस्था में भी कई बदलावों पर जोर दिया गया है। CBSE भी competency-based education यानी दक्षता आधारित शिक्षा की दिशा में काम कर रहा है, जिसमें केवल याद करने के बजाय यह देखा जाता है कि विद्यार्थी सीखी हुई चीजों को वास्तविक परिस्थितियों में कितना इस्तेमाल कर सकता है।

ऐसे में यह समझना जरूरी है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में क्या अच्छा है, CBSE और ICSE में क्या अंतर है, फिनलैंड की व्यवस्था की खासियत क्या है और भारत को आगे बढ़ने के लिए किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है।



भारत की शिक्षा व्यवस्था कैसी है?

भारत की स्कूली शिक्षा एक विशाल और विविध व्यवस्था है। देश में सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और निजी स्कूल हैं। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग बोर्ड हैं, जबकि CBSE जैसे राष्ट्रीय बोर्ड पूरे देश में व्यापक रूप से मौजूद हैं।

भारत में शिक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य बड़ी आबादी को शिक्षा उपलब्ध कराना है। देश की सामाजिक, भाषाई, आर्थिक और भौगोलिक विविधता को देखते हुए यह अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती है।

भारत की शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों को औपचारिक शिक्षा से जोड़ने का प्रयास करती है। साथ ही IIT, मेडिकल कॉलेज, विश्वविद्यालय, प्रतियोगी परीक्षाओं और व्यावसायिक शिक्षा के लिए एक मजबूत अकादमिक आधार भी तैयार करती है।

लेकिन दूसरी ओर कई जगहों पर शिक्षा अभी भी अंक, परीक्षा और याद करने के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है। अच्छे अंक प्राप्त करने का दबाव बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों पर काफी अधिक हो सकता है।

CBSE शिक्षा प्रणाली क्या है?

CBSE यानी Central Board of Secondary Education भारत का प्रमुख राष्ट्रीय स्तर का स्कूल शिक्षा बोर्ड है। CBSE की अकादमिक व्यवस्था में पाठ्यक्रम, शैक्षणिक दिशानिर्देश, अध्ययन सामग्री, मूल्यांकन और शिक्षक प्रशिक्षण जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।

CBSE का एक बड़ा फायदा इसकी व्यापक स्वीकार्यता है। जिन परिवारों को नौकरी या व्यवसाय के कारण अलग-अलग राज्यों में स्थान बदलना पड़ता है, उनके बच्चों के लिए राष्ट्रीय बोर्ड की निरंतरता उपयोगी हो सकती है।

CBSE की शिक्षा प्रणाली विशेष रूप से गणित, विज्ञान और अन्य विषयों में संरचित पाठ्यक्रम उपलब्ध कराती है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए भी CBSE और NCERT आधारित अध्ययन को अक्सर उपयोगी माना जाता है।

हालांकि इसका अनुभव हर स्कूल में एक जैसा नहीं होता। बोर्ड एक पाठ्यक्रम और मूल्यांकन ढांचा देता है, लेकिन कक्षा में उसका वास्तविक क्रियान्वयन स्कूल, शिक्षक, संसाधन और प्रबंधन पर निर्भर करता है।

CBSE के फायदे

CBSE की सबसे बड़ी ताकत उसका राष्ट्रीय स्तर का ढांचा है। एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने वाले विद्यार्थियों के लिए यह अपेक्षाकृत सुविधाजनक हो सकता है।

दूसरा फायदा है प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ तालमेल। विज्ञान और गणित जैसे विषयों में CBSE का पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को आगे की पढ़ाई के लिए आधार दे सकता है।

तीसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि CBSE अब competency-based learning और assessment को बढ़ावा दे रहा है। बोर्ड के अनुसार competency-based education का उद्देश्य विद्यार्थी के सीखने के परिणाम और किसी विशेष competency में उसकी दक्षता को देखना है।

CBSE ने कक्षा 6 से 10 के लिए गणित, विज्ञान और अंग्रेजी में competency-based assessment resources भी विकसित किए हैं।

CBSE की कमियां

CBSE की समस्या केवल बोर्ड की नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की भी है। कुछ स्कूलों में अभी भी पढ़ाई का बड़ा हिस्सा परीक्षा-केंद्रित हो सकता है।

विद्यार्थियों पर अच्छे अंक लाने का दबाव, ट्यूशन और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के कारण पढ़ाई कई बार तनावपूर्ण हो सकती है।

दूसरी समस्या यह है कि एक समान पाठ्यक्रम का मतलब यह नहीं कि हर बच्चे की सीखने की गति और रुचि भी समान होगी। एक ही कक्षा में अलग-अलग क्षमता वाले बच्चों को एक ही तरीके से पढ़ाना हमेशा प्रभावी नहीं होता।

इसलिए CBSE के competency-based approach को वास्तविक कक्षा तक पहुंचाना महत्वपूर्ण चुनौती है।

ICSE शिक्षा प्रणाली क्या है?

ICSE परीक्षा Council for the Indian School Certificate Examinations यानी CISCE द्वारा आयोजित की जाती है। CISCE की व्यवस्था में व्यापक सामान्य शिक्षा पर जोर दिया जाता है। ICSE का माध्यम मुख्य रूप से अंग्रेजी है और इसके पाठ्यक्रम में कई विषयों को विस्तार से पढ़ाया जाता है।

ICSE को अक्सर व्यापक पाठ्यक्रम और भाषा पर मजबूत जोर के लिए जाना जाता है। विद्यार्थियों को विज्ञान, गणित, इतिहास, भूगोल, भाषा और अन्य क्षेत्रों में अपेक्षाकृत विस्तृत अध्ययन करना पड़ सकता है।

इस तरह की शिक्षा उन विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सकती है जो पढ़ने, लिखने, भाषा और विषय की गहराई में रुचि रखते हैं।

ICSE के फायदे

ICSE का एक बड़ा फायदा इसका व्यापक अकादमिक दृष्टिकोण है। भाषा, सामाजिक विज्ञान और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में विस्तृत अध्ययन विद्यार्थियों को विषयों को अलग-अलग कोणों से समझने का अवसर दे सकता है।

भाषा और अंग्रेजी पर जोर विद्यार्थियों के communication skills को विकसित करने में मदद कर सकता है।

ICSE में केवल अंतिम परीक्षा पर निर्भर रहने के बजाय स्कूल-आधारित कार्य और internal assessment की भी भूमिका रहती है। इससे कुछ विद्यार्थियों को पूरे वर्ष सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय रहने का अवसर मिलता है।

ICSE की कमियां

ICSE का विस्तृत पाठ्यक्रम कुछ विद्यार्थियों के लिए भारी हो सकता है। अधिक विषयवस्तु का अर्थ यह भी हो सकता है कि विद्यार्थी को पढ़ाई के लिए अधिक समय देना पड़े।

निजी स्कूलों में ICSE शिक्षा की लागत भी कई परिवारों के लिए अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है। हालांकि फीस स्कूल के अनुसार काफी बदलती है, इसलिए इसे हर ICSE स्कूल पर लागू नहीं किया जा सकता।

एक और चुनौती यह है कि यदि शिक्षक केवल syllabus पूरा करने पर ध्यान दें और conceptual learning पर नहीं, तो विस्तृत पाठ्यक्रम भी रटने की समस्या को खत्म नहीं कर सकता।

CBSE और ICSE में क्या अंतर है?

CBSE और ICSE दोनों ही भारतीय शिक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, लेकिन दोनों की शैक्षणिक शैली में अंतर दिखाई देता है।

CBSE को सामान्यतः एक अधिक केंद्रीकृत और राष्ट्रीय स्तर पर एकरूप पाठ्यक्रम वाले बोर्ड के रूप में देखा जाता है। दूसरी ओर, ICSE अपने व्यापक सामान्य शिक्षा दृष्टिकोण और विषयों की गहराई के लिए जाना जाता है।

यदि किसी विद्यार्थी का लक्ष्य आगे चलकर JEE, NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना है तो CBSE का NCERT-केंद्रित ढांचा उपयोगी हो सकता है। वहीं जिन विद्यार्थियों की रुचि भाषा, व्यापक विषय अध्ययन और विस्तृत अकादमिक exposure में है, उनके लिए ICSE आकर्षक हो सकता है।

लेकिन केवल बोर्ड देखकर किसी बच्चे का भविष्य तय नहीं किया जा सकता। अच्छा शिक्षक, अच्छा स्कूल वातावरण और विद्यार्थी की व्यक्तिगत रुचि बोर्ड से अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

अब बात फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था की

फिनलैंड की शिक्षा प्रणाली को दुनिया के सबसे चर्चित शिक्षा मॉडलों में गिना जाता है। वहां basic education नौ वर्षों की होती है और सामान्यतः 7 से 16 वर्ष की आयु के विद्यार्थियों के लिए होती है। इसके पहले pre-primary education छह वर्ष की आयु में शुरू होती है।

फिनलैंड में compulsory education 6 से 18 वर्ष की आयु तक लागू है और इसमें pre-primary, basic तथा upper secondary education शामिल हैं।

फिनलैंड का उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करना नहीं है। वहां basic education का लक्ष्य विद्यार्थियों के ज्ञान और कौशल के साथ-साथ उन्हें जिम्मेदार नागरिक और समाज का सदस्य बनने के लिए तैयार करना भी है।

फिनलैंड मॉडल की सबसे बड़ी खासियत

फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था में student well-being और learning को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।

वहां विद्यार्थियों को केवल किताबें याद कराने के बजाय समझने, सोचने, समस्या हल करने, सहयोग करने और अपनी क्षमताओं को पहचानने के अवसर देने पर जोर है।

फिनलैंड में विद्यार्थियों के लिए learning support और pupil welfare systems भी मौजूद हैं। ये व्यवस्थाएं विद्यार्थियों की सीखने की जरूरतों और कल्याण को समर्थन देने के लिए बनाई गई हैं।

Guidance और counselling भी शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा है। विद्यार्थियों को अपनी strengths पहचानने और teamwork तथा social skills विकसित करने में मदद दी जाती है।

क्या फिनलैंड में परीक्षा बिल्कुल नहीं होती?

सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि फिनलैंड में परीक्षा नहीं होती या बच्चे बिल्कुल नहीं पढ़ते। यह पूरी तरह सही तस्वीर नहीं है।

फिनलैंड में assessment मौजूद है। वहां राष्ट्रीय core curriculum के आधार पर शिक्षा दी जाती है और विद्यार्थियों के सीखने का मूल्यांकन किया जाता है।

अंतर यह है कि शिक्षा व्यवस्था को केवल एक बड़ी अंतिम परीक्षा के आसपास केंद्रित करने के बजाय सीखने की पूरी प्रक्रिया पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

इसलिए फिनलैंड को “बिना परीक्षा वाली शिक्षा व्यवस्था” कहना गलत होगा।

फिनलैंड मॉडल की कमियां भी हैं

फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था को आदर्श मानना भी सही नहीं होगा। हाल के वर्षों में वहां भी विद्यार्थियों के learning outcomes को लेकर चिंताएं सामने आई हैं।

फिनिश National Agency for Education के अनुसार 2022 PISA परिणामों में 15 वर्षीय विद्यार्थियों की mathematics, literacy और natural sciences में performance में गिरावट देखी गई, हालांकि Finland अभी भी OECD के 38 देशों के औसत से ऊपर था।

इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—दुनिया की कोई भी शिक्षा व्यवस्था पूर्ण नहीं है।

हर देश को अपनी सामाजिक, आर्थिक, जनसंख्या और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार शिक्षा मॉडल विकसित करना पड़ता है।

भारत और फिनलैंड में सबसे बड़ा अंतर

भारत और फिनलैंड की तुलना करते समय सबसे पहले दोनों देशों के आकार और परिस्थितियों को समझना जरूरी है।

भारत की आबादी बहुत बड़ी है। यहां करोड़ों विद्यार्थी और बहुत बड़ी संख्या में स्कूल हैं। दूसरी ओर फिनलैंड की आबादी और शिक्षा व्यवस्था का आकार बहुत छोटा है।

इसलिए फिनलैंड की पूरी व्यवस्था को भारत में सीधे लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा।

लेकिन कुछ सिद्धांत भारत के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं।

भारत को फिनलैंड से teacher autonomy, student well-being, practical learning, counselling, interdisciplinary learning और learning support जैसे विचारों से सीखना चाहिए।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्याएं

भारत की शिक्षा व्यवस्था के सामने कई चुनौतियां हैं।

पहली चुनौती है रटने की संस्कृति। विद्यार्थी अक्सर परीक्षा में पूछे जाने वाले उत्तर को याद करने पर अधिक ध्यान देते हैं।

दूसरी समस्या है अंकों का अत्यधिक दबाव। अच्छे अंक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल marks को विद्यार्थी की बुद्धिमत्ता का पैमाना बनाना सही नहीं है।

तीसरी चुनौती है शिक्षकों की गुणवत्ता और training। किसी भी शिक्षा सुधार का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति शिक्षक होता है।

चौथी समस्या है शहर और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच संसाधनों का अंतर। हर बच्चे को समान गुणवत्ता का स्कूल, इंटरनेट, प्रयोगशाला, पुस्तकालय और प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध नहीं होते।

पांचवीं समस्या है career guidance की कमी। कई विद्यार्थी 10वीं या 12वीं तक पहुंचने के बाद भी यह तय नहीं कर पाते कि उन्हें आगे क्या करना है।

शिक्षा व्यवस्था में कैसे सुधार किया जा सकता है?

भारत को शिक्षा में सुधार के लिए केवल syllabus बदलने की जरूरत नहीं है। पूरे learning ecosystem को बदलना होगा।

1. रटने के बजाय समझ पर जोर

परीक्षा में यह पूछा जाना चाहिए कि विद्यार्थी किसी concept को वास्तविक जीवन में कैसे लागू कर सकता है।

गणित में केवल formula याद कराने के बजाय वास्तविक समस्याएं दी जाएं। विज्ञान में केवल definitions याद कराने के बजाय experiments कराए जाएं।

2. शिक्षक प्रशिक्षण को प्राथमिकता

शिक्षकों को केवल subject knowledge नहीं बल्कि modern teaching methods, technology, child psychology और assessment techniques की भी नियमित training मिलनी चाहिए।

CBSE पहले से teacher capacity building और competency-based education के लिए resources उपलब्ध करा रहा है। इस तरह के प्रयासों को और व्यापक बनाया जा सकता है।

3. स्कूलों में career counselling

हर माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूल में qualified career counsellor की व्यवस्था होनी चाहिए।

बच्चों को केवल डॉक्टर, इंजीनियर और सरकारी अधिकारी बनने के विकल्प न बताए जाएं। उन्हें design, coding, research, agriculture, sports, skilled trades, entrepreneurship, finance, media और अन्य क्षेत्रों के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए।

4. व्यावहारिक शिक्षा

स्कूल में financial literacy, communication, digital literacy, basic legal awareness, health education, entrepreneurship और problem-solving जैसे विषयों को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।

5. खेल और कला को पढ़ाई का दुश्मन न माना जाए

खेल, संगीत, कला और अन्य रचनात्मक गतिविधियां बच्चे के व्यक्तित्व विकास का हिस्सा हैं।

शिक्षा का लक्ष्य केवल परीक्षा में 95 या 99 प्रतिशत अंक हासिल करना नहीं होना चाहिए। एक स्वस्थ, आत्मविश्वासी, रचनात्मक और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए।

6. मानसिक स्वास्थ्य और well-being

स्कूलों में counselling और student support systems मजबूत किए जाने चाहिए।

विद्यार्थियों को यह समझना चाहिए कि कम अंक जीवन की अंतिम असफलता नहीं हैं। परीक्षा में सफलता महत्वपूर्ण है, लेकिन जीवन में सफलता के लिए resilience, communication, creativity और adaptability भी आवश्यक हैं।

7. स्थानीय भाषा और अंग्रेजी के बीच संतुलन

भारत जैसे बहुभाषी देश में बच्चों को अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में मजबूत आधार देना महत्वपूर्ण है। साथ ही अंग्रेजी और अन्य भाषाओं का ज्ञान भी भविष्य के अवसरों को बढ़ा सकता है।

इसलिए भाषा को प्रतियोगिता का विषय बनाने के बजाय बहुभाषी क्षमता को ताकत माना जाना चाहिए।

8. डिजिटल शिक्षा का सही उपयोग

AI, online learning, smart classrooms और digital resources शिक्षा को बदल सकते हैं। लेकिन केवल स्कूल में स्मार्ट बोर्ड लगा देने से शिक्षा आधुनिक नहीं बनती।

तकनीक का इस्तेमाल शिक्षक को replace करने के बजाय शिक्षक और विद्यार्थी दोनों को बेहतर learning tools देने के लिए होना चाहिए।

क्या भारत को फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था अपनानी चाहिए?

इस सवाल का जवाब है—पूरी तरह नहीं, लेकिन उससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है।

भारत को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप एक भारतीय मॉडल विकसित करना चाहिए।

CBSE की national-level structure, ICSE की व्यापक subject exposure और फिनलैंड के student-centred learning approach से अच्छे तत्व लिए जा सकते हैं।

भारत के लिए आदर्श शिक्षा मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें:

  • मजबूत foundational literacy और numeracy हो।

  • रटने की जगह conceptual learning हो।

  • परीक्षा हो लेकिन परीक्षा ही शिक्षा का केंद्र न हो।

  • शिक्षक सम्मानित और अच्छी तरह प्रशिक्षित हों।

  • बच्चों को खेल और कला के अवसर मिलें।

  • career counselling उपलब्ध हो।

  • vocational education को बराबर सम्मान मिले।

  • technology और AI का जिम्मेदारी से उपयोग हो।

  • ग्रामीण और शहरी विद्यार्थियों के बीच अवसर का अंतर कम हो।

  • मानसिक स्वास्थ्य और student well-being को महत्व मिले।

निष्कर्ष

भारत की शिक्षा व्यवस्था आज एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। CBSE competency-based education की दिशा में आगे बढ़ रहा है और राष्ट्रीय स्तर पर भी शिक्षा को अधिक holistic, flexible और skill-oriented बनाने की कोशिश की जा रही है।

CBSE की राष्ट्रीय पहुंच और structured curriculum उसकी बड़ी ताकत है। ICSE व्यापक विषय अध्ययन और भाषा कौशल के लिए जाना जाता है। वहीं फिनलैंड का मॉडल student well-being, learning support, guidance और practical learning जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है।

लेकिन किसी एक बोर्ड या देश की शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह सही और दूसरे को गलत कहना उचित नहीं होगा।

भारत की जरूरत भारतीय समाधान है।

भारत को ऐसा शिक्षा मॉडल तैयार करना होगा जिसमें बच्चे परीक्षा के लिए नहीं बल्कि जीवन के लिए सीखें। उन्हें केवल यह नहीं पता होना चाहिए कि किसी सवाल का सही उत्तर क्या है, बल्कि यह भी पता होना चाहिए कि सही सवाल कैसे पूछा जाए, समस्या को कैसे समझा जाए और समाधान कैसे खोजा जाए।

यदि भारत शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक प्रशिक्षण, practical learning, technology, counselling, vocational education, समान अवसर और competency-based assessment को मजबूत कर सके, तो आने वाली पीढ़ी केवल बेहतर अंक प्राप्त करने वाली नहीं बल्कि बेहतर सोचने, समझने और निर्णय लेने वाली पीढ़ी बन सकती है।

यही किसी भी आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की असली सफलता होगी।

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