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5 सितंबर को दिल्ली में होने वाला कॉकरोच जनता पार्टी का मार्च वापस, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बदला फैसला; जानिए पूरी वजह

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'Cockroach Janata Party's' march scheduled for September 5 in Delhi called off; decision changed following Supreme Court verdict—find out the full rea
फोटो: Kashi Hindi NEWS
एक नजर में
  • शीर्षक: 5 सितंबर को दिल्ली में होने वाला कॉकरोच जनता पार्टी का मार्च वापस, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बदला फैसला; जानिए पूरी वजह
  • श्रेणी: india
  • स्थान: वाराणसी, उत्तर प्रदेश
  • पूरी जानकारी के लिए नीचे दी गई खबर पढ़ें।

 

5 सितंबर को दिल्ली में होने वाला कॉकरोच जनता पार्टी का मार्च वापस, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बदला फैसला; जानिए पूरी वजह

नई दिल्ली। दिल्ली में 5 सितंबर 2026 को प्रस्तावित कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का विरोध मार्च अब नहीं होगा। पार्टी ने मंगलवार, 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मार्च वापस लेने की घोषणा की। यह फैसला ऐसे समय आया है जब केंद्र सरकार ने अदालत के सामने जुलाई में हुए छात्र-युवा प्रदर्शनों से जुड़े मामलों को वापस लेने और प्रदर्शनकारियों की मांगों पर आगे बढ़ने का आश्वासन दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी संबंधित एफआईआर के मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित किया।

CJP ने 24 अगस्त को 5 सितंबर के मार्च का ऐलान किया था। प्रस्तावित मार्च इंडिया गेट से नई दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक निकाला जाना था। पार्टी का कहना था कि 25 जुलाई को आंदोलन वापस लेने के समय सरकार की ओर से किए गए आश्वासनों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। लेकिन 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुई कार्यवाही के बाद परिस्थितियां बदल गईं और CJP ने फिलहाल 5 सितंबर का आंदोलन वापस ले लिया।

'Cockroach Janata Party's' march scheduled for September 5 in Delhi called off; decision changed following Supreme Court verdict—find out the full rea


5 सितंबर का मार्च आखिर क्यों निकाला जाना था?

5 सितंबर के मार्च की घोषणा अचानक नहीं हुई थी। इसकी पृष्ठभूमि जुलाई 2026 में हुए छात्र आंदोलन से जुड़ी है। CJP के नेतृत्व में यह आंदोलन NEET परीक्षा से जुड़ी अनियमितताओं, प्रश्नपत्र विवाद और परीक्षा व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों को लेकर शुरू हुआ था।

जुलाई में आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर सहित कई जगहों तक पहुंचा। 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च करने के प्रयास के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की स्थिति बनी। प्रदर्शन से जुड़े लोगों के खिलाफ अलग-अलग स्थानों पर मामले दर्ज हुए।

बाद में 25 जुलाई को आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया गया। CJP का कहना था कि सरकार के साथ बातचीत के बाद कई मांगों पर सहमति बनी थी। इनमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेना और NEET विवाद से प्रभावित परिवारों के लिए मुआवजे से जुड़ी मांगें प्रमुख थीं।

कुछ समय बाद CJP ने आरोप लगाया कि इन आश्वासनों को लागू करने की प्रक्रिया अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ रही है। इसी को लेकर संगठन ने फिर से दिल्ली में मार्च का ऐलान किया था।

24 अगस्त को CJP ने क्या घोषणा की थी?

CJP की राष्ट्रीय कार्यसमिति ने 24 अगस्त को बैठक के बाद 5 सितंबर को दिल्ली में शांतिपूर्ण मार्च करने का निर्णय लिया था। उस समय संगठन ने सरकार पर 25 जुलाई को किए गए वादों को पूरा नहीं करने का आरोप लगाया था।

प्रस्तावित कार्यक्रम के अनुसार मार्च इंडिया गेट से शुरू होकर नई दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक जाना था। CJP ने कहा था कि इस मार्च में जुलाई आंदोलन से प्रभावित परिवार, छात्र और युवा शामिल होंगे।

संगठन के अनुसार आंदोलन की अगली कार्रवाई का केंद्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और NEET विवाद से प्रभावित परिवारों की सहायता से जुड़े मुद्दे थे।

यानी 5 सितंबर का प्रस्तावित मार्च किसी नए मुद्दे पर शुरू होने वाला आंदोलन नहीं था। यह मूल रूप से जुलाई में हुए आंदोलन के बाद सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बने समझौते के क्रियान्वयन को लेकर दबाव बनाने की कोशिश थी।

फिर अचानक मार्च वापस लेने की जरूरत क्यों पड़ी?

1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले से जुड़ी सुनवाई हुई। केंद्र सरकार की ओर से अदालत में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाने की बात रखी गई।

दिल्ली पुलिस की ओर से भी जुलाई के प्रदर्शन से संबंधित एफआईआर को खत्म करने के लिए अदालत का रुख किया गया था। इसी घटनाक्रम के बीच सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित एफआईआर पर महत्वपूर्ण आदेश दिया।

CJP के सह-संयोजक और प्रवक्ता सौरव दास ने अदालत में कहा कि सरकार के सकारात्मक आश्वासन और अदालत के आदेश को देखते हुए संगठन 5 सितंबर के मार्च का आह्वान वापस ले रहा है।

यानी मार्च वापस लेने की तत्काल वजह सरकार के आश्वासन और सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक कार्रवाई बनी।

यह फैसला केवल राजनीतिक बयान के आधार पर नहीं लिया गया, बल्कि आंदोलन की जिन प्रमुख मांगों को लेकर नया मार्च प्रस्तावित किया गया था, उनमें से सबसे महत्वपूर्ण—प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामलों का निपटारा—पर अदालत के स्तर पर ठोस प्रगति सामने आने के बाद लिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर को लेकर क्या किया?

1 सितंबर की सुनवाई इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रही। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई में NEET से जुड़े प्रदर्शन के दौरान दर्ज की गई एफआईआर को लेकर अपने विशेष संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल किया।

अदालत के सामने दिल्ली के अलावा कुछ अन्य राज्यों से भी संबंधित मामले आए। अदालत ने संबंधित परिस्थितियों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को समाप्त करने की अनुमति दी।

यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का आदेश हर व्यक्ति को किसी भी आपराधिक मामले में स्वतः निर्दोष घोषित करने के समान नहीं है। अदालत का आदेश उन विशेष घटनाओं और एफआईआर से संबंधित है जो सुनवाई के सामने रखी गई थीं।

साथ ही, अदालत ने ऐसे लोगों को लेकर अलग व्यवस्था की जिनके संबंध में पुलिस ने गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि का दावा किया था। इसलिए पूरे आदेश को केवल “सभी मामलों में हर व्यक्ति को क्लीन चिट” के रूप में समझना सही नहीं होगा।

25 जुलाई को ऐसा क्या हुआ था जिससे आंदोलन रुका?

जुलाई के आंदोलन के बाद सरकार और CJP प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई थी। इसी बातचीत के बाद 25 जुलाई को आंदोलन समाप्त करने का निर्णय लिया गया।

उस समय प्रदर्शनकारियों की प्रमुख चिंताओं में परीक्षा व्यवस्था, NEET विवाद, प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमे और प्रभावित परिवारों की सहायता शामिल थी।

CJP ने आंदोलन वापस लेते समय इसे सरकार के आश्वासनों पर भरोसे के आधार पर लिया गया फैसला बताया था। संगठन का कहना था कि सरकार की ओर से दिए गए आश्वासनों को तय प्रक्रिया के अनुसार लागू किया जाएगा।

लेकिन अगस्त के अंत तक CJP का दावा था कि कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर पर्याप्त प्रगति नहीं हुई है। विशेष रूप से एफआईआर वापस लेने के मामले को लेकर संगठन ने फिर सवाल उठाए।

यहीं से 5 सितंबर के मार्च की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

क्या मुआवजे का मुद्दा भी मार्च से जुड़ा था?

हां, मुआवजा भी इस विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

NEET विवाद और उससे जुड़े घटनाक्रम के दौरान जान गंवाने वाले विद्यार्थियों के परिवारों के लिए आर्थिक सहायता की मांग आंदोलन से जुड़े मुद्दों में शामिल रही। 1 सितंबर की सुनवाई में केंद्र की ओर से प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने की प्रतिबद्धता अदालत के सामने रखी गई।

सरकार ने मुआवजे की प्रक्रिया पूरी करने के लिए समय की जरूरत बताई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार परिवारों को भुगतान करने की दिशा में सरकार ने अदालत के सामने आश्वासन दिया है।

CJP के लिए यह मुद्दा केवल आर्थिक सहायता का नहीं था। संगठन इसे जुलाई में बने समझौते के हिस्से के रूप में देख रहा था।

इसलिए अदालत में सरकार की ओर से इस मुद्दे पर आश्वासन मिलना भी 5 सितंबर के आंदोलन को वापस लेने के फैसले की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण रहा।

क्या अब CJP और सरकार के बीच विवाद पूरी तरह खत्म हो गया?

फिलहाल 5 सितंबर का मार्च वापस लिया गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि CJP और सरकार के बीच हर मुद्दे पर विवाद स्थायी रूप से समाप्त हो गया है।

मार्च वापस लेने का निर्णय इस समय सामने आए सरकारी आश्वासन और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर लिया गया है। आगे सरकार इन आश्वासनों को किस तरह लागू करती है, यह भी महत्वपूर्ण रहेगा।

विशेष रूप से मुआवजे की प्रक्रिया और अदालत के आदेश के अनुपालन पर नजर रहेगी। यदि भविष्य में CJP को लगता है कि सहमत मुद्दों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो संगठन आगे क्या रुख अपनाएगा, यह अभी अलग विषय है।

इसलिए फिलहाल सबसे सटीक बात यही है कि 5 सितंबर 2026 का घोषित दिल्ली मार्च रद्द कर दिया गया है; भविष्य की रणनीति को लेकर कोई नया आंदोलन घोषित नहीं किया गया है।

क्या 5 सितंबर को इंडिया गेट से कोई CJP मार्च होगा?

नहीं। 1 सितंबर को CJP ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट रूप से 5 सितंबर के प्रस्तावित मार्च का आह्वान वापस लेने की बात कही है।

इसलिए पहले जारी कार्यक्रम के अनुसार इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक CJP का वह मार्च अब आयोजित नहीं किया जाएगा।

यह जानकारी उन लोगों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है जो 5 सितंबर के कार्यक्रम में शामिल होने की तैयारी कर रहे थे या सोशल मीडिया पर पुराने पोस्ट और पोस्टर देख रहे हैं।

कई बार किसी कार्यक्रम की घोषणा होने के बाद पुराने पोस्ट सोशल मीडिया पर घूमते रहते हैं। इस मामले में भी 24 अगस्त की घोषणा को देखकर यह मान लेना कि 5 सितंबर को मार्च निश्चित रूप से होगा, अब सही नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका क्यों बनी निर्णायक?

इस पूरे घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण रही क्योंकि विवाद का एक बड़ा हिस्सा एफआईआर और कानूनी कार्रवाई से संबंधित था।

CJP का कहना था कि आंदोलन वापस लेने के दौरान सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामलों को वापस लेने का आश्वासन दिया गया था। जब इस दिशा में देरी को लेकर सवाल उठे तो मामला न्यायिक स्तर तक पहुंचा।

1 सितंबर को केंद्र और संबंधित पक्षों की ओर से अदालत के सामने रखी गई बातों तथा अदालत के आदेश के बाद CJP ने आंदोलन को आगे बढ़ाने के बजाय उसे वापस लेने का फैसला किया।

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि 5 सितंबर का मार्च मूल रूप से कानूनी मामलों और सरकार के आश्वासनों के क्रियान्वयन को लेकर दबाव बनाने के लिए प्रस्तावित था। जब उसी मुद्दे पर न्यायिक स्तर पर प्रगति हुई, तो मार्च की तत्काल आवश्यकता संगठन को नहीं लगी।

क्या यह CJP का स्थायी आंदोलन खत्म होना है?

इसे फिलहाल स्थायी रूप से आंदोलन खत्म होना कहना जल्दबाजी होगी।

25 जुलाई को भी आंदोलन वापस लिया गया था, लेकिन बाद में सरकार के आश्वासनों पर सवाल उठने के बाद 5 सितंबर का नया मार्च घोषित हुआ। अब सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई के बाद वह मार्च वापस लिया गया है।

इससे संकेत मिलता है कि CJP आगे सरकार द्वारा किए गए आश्वासनों के पालन पर नजर रखेगा। खासकर एफआईआर और मुआवजे से संबंधित कार्रवाई की वास्तविक स्थिति संगठन के अगले रुख को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए पाठकों के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण अपडेट यही है कि 5 सितंबर की प्रस्तावित कार्रवाई रद्द हो चुकी है, जबकि जुलाई के आंदोलन से जुड़े व्यापक मुद्दों पर सरकारी और न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।

पुराने और नए फैसले में क्या फर्क है?

24 अगस्त को स्थिति यह थी कि CJP सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए फिर से सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहा था।

1 सितंबर को तस्वीर बदल गई।

अब सरकार ने अदालत में अपने पुराने आश्वासनों को पूरा करने की दिशा में कदम उठाने की बात कही है, प्रदर्शनकारियों से जुड़े मामलों पर न्यायिक कार्रवाई हुई है और CJP ने इसी आधार पर मार्च वापस लेने की घोषणा कर दी है।

यानी 24 अगस्त से 1 सितंबर के बीच घटनाक्रम का केंद्र राजनीतिक विरोध से न्यायिक समाधान की ओर चला गया।

निष्कर्ष

दिल्ली में 5 सितंबर 2026 को प्रस्तावित कॉकरोच जनता पार्टी का मार्च अब नहीं होगा। CJP ने 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में इस मार्च को वापस लेने की घोषणा की। संगठन ने यह फैसला केंद्र सरकार के सकारात्मक आश्वासन और अदालत की ओर से जुलाई के प्रदर्शन से जुड़े एफआईआर मामले में की गई कार्रवाई के बाद लिया है।

मार्च की घोषणा 24 अगस्त को की गई थी। इसका उद्देश्य 25 जुलाई को आंदोलन समाप्त करते समय सरकार की ओर से किए गए आश्वासनों, खासकर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामलों और प्रभावित परिवारों से जुड़े मुद्दों पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाना था।

अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सरकार के आश्वासन के बाद CJP ने फिलहाल विरोध मार्च का रास्ता छोड़ दिया है। हालांकि आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकारी आश्वासनों और अदालत के निर्देशों को जमीन पर किस तरह लागू किया जाता है। फिलहाल 5 सितंबर को इंडिया गेट से प्रस्तावित CJP मार्च रद्द है

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