मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में भारत की नई उड़ान: क्या दुनिया का अगला ‘मोबाइल गुरु’ बनेगा भारत?
नई दिल्ली। कभी मोबाइल फोन के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहने वाला भारत आज दुनिया के प्रमुख मोबाइल विनिर्माण केंद्रों में शामिल हो चुका है। पिछले एक दशक में देश में मोबाइल फोन उत्पादन, निर्यात, विनिर्माण इकाइयों और इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम का जिस तेजी से विस्तार हुआ है, उसने भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। अब सवाल केवल इतना नहीं है कि भारत में मोबाइल फोन कितने बन रहे हैं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत आने वाले वर्षों में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का वैश्विक ‘गुरु’ बन सकता है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत 2024-25 तक दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन चुका था। मोबाइल फोन का उत्पादन 2014-15 में लगभग 18,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में करीब 5.45 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसी अवधि में मोबाइल फोन का निर्यात 1,500 करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 2 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।
जुलाई 2026 में जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में मोबाइल फोन उत्पादन का मूल्य 6.27 लाख करोड़ रुपये और निर्यात 2.60 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। सरकार के अनुसार मोबाइल फोन 2025-26 में भारत का सबसे बड़ा निर्यात उत्पाद भी बन गया।
कभी 75 फीसदी मोबाइल होते थे आयात
भारत के मोबाइल बाजार की कहानी पिछले दशक में नाटकीय रूप से बदली है। 2014-15 में देश में बिकने वाले मोबाइल फोन की घरेलू मांग का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा होता था। लेकिन 2024-25 तक यह स्थिति लगभग पूरी तरह बदल गई और सरकारी आंकड़ों के अनुसार आयातित मोबाइल फोन घरेलू मांग का सिर्फ 0.02 प्रतिशत रह गए।
यह बदलाव केवल मोबाइल फोन बनाने वाली कुछ फैक्ट्रियों की वजह से नहीं आया। इसके पीछे भारत में एक व्यापक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करने की कोशिश रही है, जिसमें बड़े असेंबली प्लांट, कंपोनेंट सप्लायर, इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर, लॉजिस्टिक्स, टेस्टिंग और सप्लाई चेन शामिल हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2014 में देश में केवल दो मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट थीं, जबकि अब यह संख्या 300 से अधिक हो चुकी है।
उत्पादन में 33 गुना से अधिक की छलांग
भारत की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग यात्रा को आंकड़ों में देखें तो इसकी रफ्तार स्पष्ट दिखाई देती है।
2014-15 में मोबाइल फोन उत्पादन करीब 18,900 करोड़ रुपये था। 2025-26 में यह बढ़कर करीब 6.27 लाख करोड़ रुपये हो गया। यानी लगभग 33 गुना वृद्धि। इसी दौरान मोबाइल फोन का निर्यात 1,566 करोड़ रुपये से बढ़कर 2.60 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
यह बदलाव भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मोबाइल फोन अब केवल घरेलू खपत की वस्तु नहीं रह गए हैं। भारत में बनने वाले फोन दुनिया के दूसरे देशों में भी भेजे जा रहे हैं।
यही वह बिंदु है जहां ‘Make in India’ का असर वैश्विक व्यापार से जुड़ता दिखाई देता है।
PLI योजना ने बदली तस्वीर
भारत में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने में Production Linked Incentive यानी PLI योजना की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए PLI योजना 2020 में शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य देश में मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उत्पादन बढ़ाना, निवेश आकर्षित करना, निर्यात को बढ़ावा देना और वैश्विक कंपनियों को भारत में उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करना था।
फरवरी 2026 तक बड़े पैमाने की इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग PLI योजना के तहत 32 लाभार्थी कंपनियां मंजूर की गई थीं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2026 तक योजना के तहत निवेश लगभग 17,519 करोड़ रुपये, उत्पादन करीब 11.02 लाख करोड़ रुपये और निर्यात लगभग 6.21 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया था। प्रत्यक्ष रोजगार करीब 1.85 लाख रहा।
इससे पता चलता है कि सरकारी प्रोत्साहन और निजी निवेश के मेल से भारत ने मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में बड़े पैमाने पर क्षमता तैयार की है।
Apple समेत वैश्विक कंपनियों की भारत पर नजर
भारत की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग कहानी में वैश्विक ब्रांडों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। खासतौर पर Apple के iPhone उत्पादन और निर्यात ने भारत को वैश्विक स्मार्टफोन सप्लाई चेन में अधिक महत्वपूर्ण बनाया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में भारत से Apple के iPhone निर्यात का मूल्य करीब 1,10,989 करोड़ रुपये रहा, जो एक साल पहले की तुलना में 42 प्रतिशत वृद्धि थी।
यह सिर्फ एक कंपनी की कहानी नहीं है। भारत में वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों और उनके सप्लायर्स की मौजूदगी बढ़ने से स्थानीय स्तर पर विनिर्माण क्षमता, रोजगार और सप्लाई चेन विकसित हो रही है।
तमिलनाडु और कर्नाटक बने बड़े केंद्र
भारत के मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग नक्शे में कुछ राज्य तेजी से आगे आए हैं। तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन और मोबाइल असेंबली के महत्वपूर्ण केंद्र बन रहे हैं।
सरकारी जानकारी के अनुसार होसुर और श्रीपेरंबदूर जैसे तमिलनाडु के औद्योगिक क्षेत्र तथा बेंगलुरु जैसे कर्नाटक के केंद्र मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में बड़ी संख्या में रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं। जुलाई 2026 के सरकारी आंकड़ों में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े करीब 25 लाख रोजगार और मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में करीब 12 लाख नौकरियों का उल्लेख किया गया है। मोबाइल विनिर्माण की प्रत्यक्ष कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत बताई गई है।
इसका अर्थ यह है कि मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग केवल तकनीकी क्षेत्र नहीं है, बल्कि रोजगार और औद्योगिक विकास का भी बड़ा माध्यम बन रही है।
भारत के लिए मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग क्यों महत्वपूर्ण?
भारत में हर साल करोड़ों स्मार्टफोन की जरूरत होती है। देश में करीब एक अरब के आसपास मोबाइल उपकरण सक्रिय उपयोग में होने का सरकारी पृष्ठभूमि दस्तावेज में उल्लेख है।
मोबाइल फोन आज केवल बातचीत का माध्यम नहीं है। यह बन चुका है:
- डिजिटल बैंकिंग का साधन
- ऑनलाइन शिक्षा का माध्यम
- सरकारी सेवाओं तक पहुंच
- डिजिटल भुगतान का उपकरण
- मनोरंजन का माध्यम
- ई-कॉमर्स का जरिया
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म
- काम और व्यवसाय का उपकरण
इसलिए मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में आत्मनिर्भरता का असर अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों पर पड़ता है।
क्या भारत चीन को चुनौती दे सकता है?
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन है। चीन लंबे समय से दुनिया के सबसे बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्टफोन उत्पादन केंद्रों में रहा है।
भारत के पास एक बड़ा घरेलू बाजार, युवा कार्यबल, बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करने की क्षमता है। लेकिन केवल असेंबली बढ़ाने से भारत मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का ‘विश्व गुरु’ नहीं बन जाएगा।
भारत को अगला कदम उठाना होगा।
केवल असेंबली नहीं, कंपोनेंट भी
मोबाइल फोन बनाने में डिस्प्ले, बैटरी, कैमरा मॉड्यूल, चिप, मेमोरी, सेंसर, कनेक्टर, PCB और कई दूसरे महत्वपूर्ण हिस्से लगते हैं।
अगर भारत केवल दूसरे देशों से इन हिस्सों को आयात करके यहां फोन जोड़ता है तो घरेलू मूल्यवर्धन सीमित रहेगा।
यही वजह है कि अब भारत के लिए अगली चुनौती component manufacturing है।
जुलाई 2026 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में घरेलू value addition करीब 23 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जो पहले लगभग 15 प्रतिशत बताई गई थी।
यह सुधार महत्वपूर्ण है, लेकिन वैश्विक स्तर पर अत्यधिक प्रतिस्पर्धी इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के लिए घरेलू मूल्यवर्धन को और बढ़ाना जरूरी होगा।
Semiconductor में आत्मनिर्भरता होगी निर्णायक
मोबाइल फोन की असली ताकत उसके चिप और semiconductor ecosystem में है।
स्मार्टफोन में इस्तेमाल होने वाले processors, memory chips और अन्य semiconductor components आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में हैं।
अगर भारत मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ semiconductor manufacturing, chip design, packaging और testing में मजबूत होता है, तो देश की स्थिति काफी बदल सकती है।
सरकार ने Semiconductor Mission और संबंधित नीतियों के माध्यम से इस क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की कोशिश की है। फरवरी 2026 के सरकारी विवरण के अनुसार semiconductor ecosystem विकसित करने के लिए कई परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है।
यही क्षेत्र भविष्य में भारत की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग महत्वाकांक्षा की सबसे बड़ी परीक्षा हो सकता है।
भारत के सामने क्या चुनौतियां हैं?
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में तेजी के बावजूद भारत के सामने कई चुनौतियां हैं।
1. चीन से प्रतिस्पर्धा
चीन के पास दशकों से विकसित इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन है। भारत को उस स्तर तक पहुंचने में समय लगेगा।
2. कंपोनेंट निर्माण
मोबाइल के महत्वपूर्ण हिस्सों का घरेलू उत्पादन बढ़ाना जरूरी है।
3. कौशल
मोबाइल और semiconductor उद्योग के लिए उच्च स्तर के तकनीकी कौशल की जरूरत होती है।
4. अनुसंधान एवं विकास
भारत को केवल दूसरे देशों की डिजाइन और तकनीक पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
भविष्य में भारतीय कंपनियों को:
- मोबाइल चिप
- कैमरा तकनीक
- बैटरी
- ऑपरेटिंग सिस्टम
- AI hardware
- communication technology
जैसे क्षेत्रों में R&D बढ़ाना होगा।
5. लॉजिस्टिक्स
वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में समय बहुत महत्वपूर्ण है। किसी कंपनी के लिए उत्पादन लागत के साथ-साथ माल की तेज और भरोसेमंद डिलीवरी भी जरूरी होती है।
6. वैश्विक व्यापार नीतियां
अमेरिका, यूरोप और दूसरे बड़े बाजारों की टैरिफ और व्यापार नीतियां भारतीय निर्यात पर असर डाल सकती हैं।
भारत को क्या करना होगा?
अगर भारत वास्तव में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का वैश्विक नेता बनना चाहता है तो अगले चरण में कुछ बड़े कदम आवश्यक होंगे।
पहला—कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग
मोबाइल फोन के अधिक से अधिक हिस्सों का निर्माण भारत में होना चाहिए।
दूसरा—Chip Manufacturing
Semiconductor ecosystem को मजबूत करना होगा।
तीसरा—Indian Brands
भारत को केवल विदेशी कंपनियों का manufacturing base नहीं बनना चाहिए।
भारतीय कंपनियों को भी वैश्विक स्मार्टफोन बाजार में मजबूत ब्रांड बनाना होगा।
चौथा—R&D
भारत में मोबाइल डिजाइन और तकनीक विकसित होनी चाहिए।
पांचवां—Skilled Workforce
इलेक्ट्रॉनिक्स, semiconductor, AI, embedded systems और hardware engineering के लिए बड़ी संख्या में कुशल युवाओं को तैयार करना होगा।
छठा—Export Infrastructure
भारत को दुनिया के बड़े बाजारों तक तेज और प्रतिस्पर्धी निर्यात व्यवस्था विकसित करनी होगी।
मोबाइल से आगे बढ़ेगा इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स क्रांति का पहला बड़ा चरण है।
इसके बाद भारत के लिए अवसर हैं:
- लैपटॉप
- टैबलेट
- स्मार्ट टीवी
- सर्वर
- इलेक्ट्रिक वाहन इलेक्ट्रॉनिक्स
- मेडिकल इलेक्ट्रॉनिक्स
- औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक्स
- telecom equipment
- semiconductor
- AI hardware
- IoT devices
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत का कुल इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन 2014-15 के लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में करीब 11.3 लाख करोड़ रुपये हो गया। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात भी लगभग 38,000 करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 3.27 लाख करोड़ रुपये हो गया।
इसलिए मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग की सफलता को भारत के बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स सपने की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है।
2025 में स्मार्टफोन बना भारत का बड़ा निर्यात उत्पाद
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2025 में स्मार्टफोन भारत के शीर्ष निर्यात उत्पादों में सबसे ऊपर रहा। कैलेंडर वर्ष 2025 में स्मार्टफोन निर्यात का मूल्य करीब 2.62 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया।
यह आंकड़ा भारतीय मोबाइल उद्योग के लिए महत्वपूर्ण संकेत है।
इसका अर्थ है कि भारत अब केवल अपने नागरिकों के लिए मोबाइल नहीं बना रहा, बल्कि दुनिया के बाजारों के लिए भी उत्पादन कर रहा है।
महिलाओं के लिए भी बढ़ते रोजगार के अवसर
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ना है।
बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स प्लांट में असेंबली, गुणवत्ता जांच, पैकेजिंग, टेस्टिंग और विभिन्न उत्पादन प्रक्रियाओं में महिलाओं की बड़ी भागीदारी देखी जा रही है।
जुलाई 2026 के सरकारी आंकड़ों में मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग की प्रत्यक्ष कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत बताई गई है।
अगर यह उद्योग आगे भी तेजी से बढ़ता है तो भारत के औद्योगिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में इसका योगदान महत्वपूर्ण हो सकता है।
क्या भारत सच में बनेगा ‘मोबाइल गुरु’?
यह दावा अभी भविष्य की संभावना है, वर्तमान की स्थिति नहीं।
भारत निश्चित रूप से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मोबाइल निर्माता के रूप में एक मजबूत स्थिति हासिल कर चुका है। उत्पादन और निर्यात में तेज वृद्धि हुई है और देश वैश्विक सप्लाई चेन में महत्वपूर्ण स्थान बना रहा है।
लेकिन ‘विश्व गुरु’ बनने के लिए भारत को केवल बड़े पैमाने पर फोन असेंबल करने से आगे जाना होगा।
भारत को ऐसी स्थिति बनानी होगी जहां:
फोन की डिजाइन भारत में हो → चिप तकनीक भारत में विकसित हो → कंपोनेंट भारत में बनें → फोन भारत में तैयार हो → भारतीय ब्रांड दुनिया में बिके → और भारत से वैश्विक तकनीक का निर्यात हो।
यही असली आत्मनिर्भरता होगी।
आने वाले वर्षों में क्या बदल सकता है?
अगर भारत घरेलू कंपोनेंट निर्माण, semiconductor, R&D, कौशल विकास और भारतीय ब्रांडों को मजबूत करने में सफल होता है, तो मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग भारत की अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक बन सकती है।
आज भारत में बनने वाला मोबाइल फोन किसी अमेरिकी, कोरियाई, चीनी या अन्य वैश्विक ब्रांड का हो सकता है। अगला लक्ष्य यह होना चाहिए कि भारत केवल दुनिया के लिए manufacturing destination न रहे, बल्कि technology और product innovation hub भी बने।
निष्कर्ष: असेंबली से टेक्नोलॉजी लीडर बनने की चुनौती
भारत की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग कहानी पिछले दस वर्षों में असाधारण रूप से बदली है। 2014-15 में जहां मोबाइल उत्पादन लगभग 18,000 करोड़ रुपये था, वहीं 2025-26 में यह 6.27 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। मोबाइल निर्यात भी 1,566 करोड़ रुपये से बढ़कर 2.60 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा। भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता है।
लेकिन यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है।
भारत के लिए अगला लक्ष्य सिर्फ “Made in India” मोबाइल बनाना नहीं, बल्कि “Designed, Developed and Made in India” तकनीक तैयार करना होना चाहिए।
अगर भारत मोबाइल असेंबली के साथ semiconductor, components, software, AI, R&D और अपने वैश्विक ब्रांडों को भी मजबूत करता है, तो आने वाले वर्षों में देश मोबाइल और व्यापक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में दुनिया के सबसे प्रभावशाली केंद्रों में शामिल हो सकता है।
आज भारत दूसरे नंबर पर है। अगली चुनौती नंबर एक बनना भर नहीं है—बल्कि ऐसी पूरी तकनीकी और औद्योगिक क्षमता तैयार करना है, जिससे दुनिया भारत को केवल मोबाइल बनाने वाले देश के रूप में नहीं, बल्कि मोबाइल तकनीक के वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में देखे।

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